भार्तीय सेना, ओ.बी.आई की स्वास्थ्य सेवा
ओ.बी.आई. द्वारा स्वास्थ्य के सबसे मिशन को प्राप्त करने में उनका एक अनोखा सहायक रहा है – भार्तीय सेना।कचाई गाँव वह स्थान था जहा पर स्वास्थ्य शिविर को लगाया गया था जो उखरुल की पहाड़ियों में उखरुल ज़िले में समुद्र तट से 3000 कि.मी. की ऊँचाई पर स्थित है।...
ओ.बी.आई. द्वारा स्वास्थ्य के सबसे मिशन को प्राप्त करने में उनका एक अनोखा सहायक रहा है – भार्तीय सेना।कचाई गाँव वह स्थान था जहा पर स्वास्थ्य शिविर को लगाया गया था जो उखरुल की पहाड़ियों में उखरुल ज़िले में समुद्र तट से 3000 कि.मी. की ऊँचाई पर स्थित है। उरूखुल ज़िला मयानमार की सरहद पर पर स्थित है। वह चंदेल ज़िले, के पूर्व में है जो इम्फाल प्रान्त का एक ज़िला है। तथा एक ओर जहाँ सेनापति ज़िले से और दूसरी ओर नागालैण्ड प्रान्त से घिरा है। यहाँ की पहाड़ियाँ 913 मीटर की ऊँचाई से लेकर 3114 मीटर की ऊँचाई तक पाई जाती हैं। क्योंकि यहाँ का भौगोलिक क्षेत्र इतना जटिल है कि वहाँ पर जिस किसी सरकारी नेता का चुनाव हुआ है उसने इस क्षेत्र की उन्नति की ओर ध्यान नहीं दिया था। यह क्षेत्र में अधिकतर तंगखुल नागा लोग बसते हैं। इसके साथ कुछ कुकीज़, नेपाली तथा कुछ अन्य जाति के लोग भी रहते हैं। तंगखुल साफ रंग के और उनके नैन नक्श मंगोलिया के लोगों के सामान लगते हैं।
सालों-साल सरकार की बेरूखी ने तंगखुल लोगों को घोर परिश्रम करने वाला बना दिया था। यहाँ के लोग बहुत ही अधिक आगे बढ़ कर काम करने वाले हैं और बिना सरकार की सहायता के जीवन को चुनौती के साथ जी रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधाएँ यहाँ पर थी ही नहीं। जब कभी वहाँ की जन जाति के लोग बीमार पड़ते थे तो वह उसे अपनी किस्मत समझ कर ग्रहण कर लेते थे। यह इस लिए भी था कि वहाँ पर स्वास्थ्य से प्राप्त करने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता था और वह इतना मँहगा था कि गरीब जन जाति के किसान तथा दैनिक मज़दूरों के लिए मानों असम्भव था।
इस ज़िले की यात्रा करना अति कठिन था इस लिए ओ.बी.आई ने सेना के जवानों से निवेदन किया था कि वे वहाँ तक पहुँचने में उनकी सहायता करें जिससे वे उरूखुल के दूर-दूर क्षेत्र में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्थ करा सकें। कुछ क्षेत्रों तक पहुँचना बहुत ही कठिन था क्योंकि वहाँ की अनेक सड़कों पर का तारकोल टूट चुका था और सड़कें पथरीली बन चुकी थीं। फिर अनेक स्थानों पर सड़कों के मोड़ बहुत ही खतरनाक थे क्योंकि अचानक से सड़क 80 डिगरी की तीखी चढ़ाई चढ़ने लगती थी। जिन को चढ़ना और भी कठिन हो जाता था जब पहाड़ी इलाके में तेज़ वर्षा होने लगती है। ऐसे समय में सेना के चतुर चालक उनकी गाड़ी को ख़तरनाक मोड़ों से बड़ी चतुराई से पार ले जाता था। हालाँकि यह सफर केवल 50 कि.मी. का था पर चालकों को कच्चाई गाँव में पहुँचने में पूरे तीन घंटे लगे थे।
गाँवों को पहले से ही सूचना दी जा चुकी थी। और वे बड़ी उत्सुकता से स्वास्थ्य दल की प्रतीक्षा कर रहे थे। बड़े आनन्द और मुस्कराहटों के साथ लोगों ने ओ.बी.आई. के दल तथा सेना का स्वागत किया था। इस पूरे दल में डॉक्टरों, नर्सों, और जाँच करने वालों तथा सेना के 20 जवान थे। इनके साथ एक स्वास्थ्य अध्यक्ष भी थे। इन्हें देख कर लोगों के मन आनन्द से भरे हुए थे।
जैसे ही शिविर का आयोजन कर दिया गया था गाँव के लोग पंक्तियाँ बना कर खड़े हो गए थे। जल्दी ही डॉक्टरों ने रोगियों को देखना शुरू किया। और अन्य जाँच का कार्य करने वालों ने भी अपना जाँच कार्य शुरू कर दिया था। हर जाँच निशुल्क थी तथा जिन को ज़रूरत थी उन को निशुल्क दवाएँ भी दी गई थीं। सब को स्वास्थ्य, सफाई तथा रोगों को कैसे बचा जा सकता है, इस विषय पर सलाह दी गई थी। उस शिविर में भाग लेने के लिए दूसरे गाँव के लोग भी आए थे। उन में से कितनो को 10 से 12 कि. मीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ी थी।
उस शिविर से एक 28 वर्ष की स्त्री ने अपनी गवाही शिविर में सब के सामने दी थी। थ्रेटी, जो 28 वर्ष की थी और जिसका विवाह एक परिवहन कम्पनी के एक सहायक कार्यकर्ता के साथ हुआ था। उसका पति सदा अपने काम के सिलसिले में यात्रा करता रहता था। और जब वह लम्बे समय के लिए घर से बाहर रहता था तब थ्रेटी को अकेले ही घर सम्भालना पड़ता था। ऐसे ही समय में एक बार उसका बेटा जो केवल एक साल का था बिमार पड़ गया। एक सप्ताह बीत चुका था और उसकी हालत में कोई सुधार नहीं था। थ्रेटी स्वयं भी गले के रोग से पीड़ित थी। ऐसे समय वह बहुत घबरा गई थी।
पर उसको आराम देने के लिए ओ.बी.आई. और सेना उसके गाँव में पहुँच चुकी थी। उसने शिविर में अपना नाम दर्ज कराया और वहाँ से अपना और अपने बेटे का सेना के डॉक्टर से इलाज कराया था। डॉक्टर ने थ्रेटी को आश्वासन दिया था कि वह और उसका बेटा पूरी तरह ठीक हो जाएँगे। डॉक्टर ने सलाह भी दी थी कि वह अपनी और अपने बच्चे की सेहत का कैसे अच्छी तरह ख्याल रख सकती है। थ्रेटी का कहना था, “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि एक दल इतनी दूर से इतनी ऊँचाई पर मेरे कठिन समय मे मेरी सहायता के लिए आएगा। धन्यवाद हो ओ.बी.आई का, आप को निश्चय ही हमारी चिन्ता है।”
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